महाभारत 1.126.7
स सामाजजनः सर्वो निश्चलः स्थिरलोचनःकोऽयमित्यागतक्षोभः कौतूहलपरोऽभवत्
sa sāmājajanaḥ sarvo niścalaḥ sthiralocanaḥko'yamityāgatakṣobhaḥ kautūhalaparo'bhavat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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