महाभारत 1.15.5
सूत उवाच · sūta uvāca
ज्वलन्तमचलं मेरुं तेजोराशिमनुत्तमम्आक्षिपन्तं प्रभां भानोः स्वशृङ्गैः काञ्चनोज्ज्वलैः
jvalantamacalaṃ meruṃ tejorāśimanuttamamākṣipantaṃ prabhāṃ bhānoḥ svaśṛṅgaiḥ kāñcanojjvalaiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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