महाभारत 1.15.8अगम्यं मनसाप्यन्यैर्नदीवृक्षसमन्वितम्नानापतगसंघैश्च नादितं सुमनोहरैःagamyaṃ manasāpyanyairnadīvṛkṣasamanvitamnānāpatagasaṃghaiśca nāditaṃ sumanoharaiḥइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें