महाभारत 1.171.2
वृथारोषप्रतिज्ञो हि नाहं जीवितुमुत्सहेअनिस्तीर्णो हि मां रोषो दहेदग्निरिवारणिम्
vṛthāroṣapratijño hi nāhaṃ jīvitumutsaheanistīrṇo hi māṃ roṣo dahedagnirivāraṇim
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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