महाभारत 1.177.3
सुकुण्डलश्चित्रसेनः सुवर्चाः कनकध्वजःनन्दको बाहुशाली च कुण्डजो विकटस्तथा
sukuṇḍalaścitrasenaḥ suvarcāḥ kanakadhvajaḥnandako bāhuśālī ca kuṇḍajo vikaṭastathā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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