महाभारत 1.18.8
सर्पसत्रे वर्तमाने पावको वः प्रधक्ष्यतिजनमेजयस्य राजर्षेः पाण्डवेयस्य धीमतः
sarpasatre vartamāne pāvako vaḥ pradhakṣyatijanamejayasya rājarṣeḥ pāṇḍaveyasya dhīmataḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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