महाभारत 1.2.6
अथर्चीकादयोऽभ्येत्य पितरो ब्राह्मणर्षभम्तं क्षमस्वेति सिषिधुस्ततः स विरराम ह
atharcīkādayo'bhyetya pitaro brāhmaṇarṣabhamtaṃ kṣamasveti siṣidhustataḥ sa virarāma ha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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