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महाभारत 1.4.3
तमृषय ऊचुःपरमं लोमहर्षणे प्रक्ष्यामस्त्वां वक्ष्यसि च नः शुश्रूषतां कथायोगम्तद्भगवांस्तु तावच्छौनकोऽग्निशरणमध्यास्ते
tamṛṣaya ūcuḥparamaṃ lomaharṣaṇe prakṣyāmastvāṃ vakṣyasi ca naḥ śuśrūṣatāṃ kathāyogamtadbhagavāṃstu tāvacchaunako'gniśaraṇamadhyāste
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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