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महाभारत 1.78.22
वैशंपायन उवाच · vaiśaṃpāyana uvāca
श्रुत्वा तस्यास्ततो वाक्यं देवयान्यब्रवीदिदम्राजन्नाद्येह वत्स्यामि विप्रियं मे कृतं त्वया
śrutvā tasyāstato vākyaṃ devayānyabravīdidamrājannādyeha vatsyāmi vipriyaṃ me kṛtaṃ tvayā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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