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महाभारत 1.78.40
शुक्र उवाच · śukra uvāca
संक्रामयिष्यसि जरां यथेष्टं नहुषात्मजमामनुध्याय भावेन न च पापमवाप्स्यसि
saṃkrāmayiṣyasi jarāṃ yatheṣṭaṃ nahuṣātmajamāmanudhyāya bhāvena na ca pāpamavāpsyasi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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