महाभारत 1.78.9
ययातिर्देवयान्यां तु पुत्रावजनयन्नृपःयदुं च तुर्वसुं चैव शक्रविष्णू इवापरौ
yayātirdevayānyāṃ tu putrāvajanayannṛpaḥyaduṃ ca turvasuṃ caiva śakraviṣṇū ivāparau
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें