महाभारत 1.95.3
अथापरं महेष्वासं सत्यवत्यां पुनः प्रभुःविचित्रवीर्यं राजानं जनयामास वीर्यवान्
athāparaṃ maheṣvāsaṃ satyavatyāṃ punaḥ prabhuḥvicitravīryaṃ rājānaṃ janayāmāsa vīryavān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें