महाभारत 1.98.31
तां स दीर्घतमाङ्गेषु स्पृष्ट्वा देवीमथाब्रवीत्भविष्यति कुमारस्ते तेजस्वी सत्यवागिति
tāṃ sa dīrghatamāṅgeṣu spṛṣṭvā devīmathābravītbhaviṣyati kumāraste tejasvī satyavāgiti
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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