महाभारत 1.98.7
उतथ्यस्य यवीयांस्तु पुरोधास्त्रिदिवौकसाम्बृहस्पतिर्बृहत्तेजा ममतां सोऽन्वपद्यत
utathyasya yavīyāṃstu purodhāstridivaukasāmbṛhaspatirbṛhattejā mamatāṃ so'nvapadyata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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