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महाभारत 10.1.13
आज्ञाप्य पृथिवीं सर्वां स्थित्वा मूर्ध्नि च संजयकथमद्य भविष्यामि प्रेष्यभूतो दुरन्तकृत्
ājñāpya pṛthivīṃ sarvāṃ sthitvā mūrdhni ca saṃjayakathamadya bhaviṣyāmi preṣyabhūto durantakṛt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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