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महाभारत 10.2.5
पर्जन्यः पर्वते वर्षन्किं नु साधयते फलम्कृष्टे क्षेत्रे तथावर्षन्किं नु साधयते फलम्
parjanyaḥ parvate varṣankiṃ nu sādhayate phalamkṛṣṭe kṣetre tathāvarṣankiṃ nu sādhayate phalam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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