महाभारत 10.9.2
गत्वा चैनमपश्यंस्ते किंचित्प्राणं नराधिपम्ततो रथेभ्यः प्रस्कन्द्य परिवव्रुस्तवात्मजम्
gatvā cainamapaśyaṃste kiṃcitprāṇaṃ narādhipamtato rathebhyaḥ praskandya parivavrustavātmajam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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