महाभारत 12.129.9
युधिष्ठिर उवाच · yudhiṣṭhira uvāca
आभ्यन्तरे प्रकुपिते बाह्ये चोपनिपीडितेक्षीणे कोशे स्रुते मन्त्रे किं कार्यमवशिष्यते
ābhyantare prakupite bāhye copanipīḍitekṣīṇe kośe srute mantre kiṃ kāryamavaśiṣyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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