महाभारत 12.227.4
सद्भ्य आगतविज्ञानः शिष्टः शास्त्रविचक्षणःस्वधर्मेण क्रिया लोके कुर्वाणः सत्यसंगरः
sadbhya āgatavijñānaḥ śiṣṭaḥ śāstravicakṣaṇaḥsvadharmeṇa kriyā loke kurvāṇaḥ satyasaṃgaraḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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