महाभारत 12.267.3
कुतः सृष्टमिदं विश्वं ब्रह्मन्स्थावरजङ्गमम्प्रलये च कमभ्येति तद्भवान्प्रब्रवीतु मे
kutaḥ sṛṣṭamidaṃ viśvaṃ brahmansthāvarajaṅgamampralaye ca kamabhyeti tadbhavānprabravītu me
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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