महाभारत 12.267.7
आपश्चैवान्तरिक्षं च पृथिवी वायुपावकौअसिद्धिः परमेतेभ्यो भूतेभ्यो मुक्तसंशयम्
āpaścaivāntarikṣaṃ ca pṛthivī vāyupāvakauasiddhiḥ parametebhyo bhūtebhyo muktasaṃśayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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