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महाभारत 12.287.2
किं श्रेयः का गतिर्ब्रह्मन्किं कृतं न विनश्यतिक्व गतो न निवर्तेत तन्मे ब्रूहि महामुने
kiṃ śreyaḥ kā gatirbrahmankiṃ kṛtaṃ na vinaśyatikva gato na nivarteta tanme brūhi mahāmune
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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