महाभारत 12.293.23
धार्यते हि त्वया ग्रन्थ उभयोर्वेदशास्त्रयोःन तु ग्रन्थस्य तत्त्वज्ञो यथावत्त्वं नरेश्वर
dhāryate hi tvayā grantha ubhayorvedaśāstrayoḥna tu granthasya tattvajño yathāvattvaṃ nareśvara
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें