महाभारत 12.293.7
एवं तां क्षपयित्वा हि जायते नृपसत्तमसा ह्यस्य प्रकृतिर्दृष्टा तत्क्षयान्मोक्ष उच्यते
evaṃ tāṃ kṣapayitvā hi jāyate nṛpasattamasā hyasya prakṛtirdṛṣṭā tatkṣayānmokṣa ucyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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