महाभारत 12.331.32
पश्चान्नारदमव्यग्रौ पाद्यार्घ्याभ्यां प्रपूज्य चपीठयोश्चोपविष्टौ तौ कृतातिथ्याह्निकौ नृप
paścānnāradamavyagrau pādyārghyābhyāṃ prapūjya capīṭhayoścopaviṣṭau tau kṛtātithyāhnikau nṛpa
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें