महाभारत 12.42.12
स विजित्य महीं कृत्स्नामानृण्यं प्राप्य वैरिषुनिःसपत्नः सुखी राजा विजहार युधिष्ठिरः
sa vijitya mahīṃ kṛtsnāmānṛṇyaṃ prāpya vairiṣuniḥsapatnaḥ sukhī rājā vijahāra yudhiṣṭhiraḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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