महाभारत 12.5.5
स विकारं शरीरस्य दृष्ट्वा नृपतिरात्मनःप्रीतोऽस्मीत्यब्रवीत्कर्णं वैरमुत्सृज्य भारत
sa vikāraṃ śarīrasya dṛṣṭvā nṛpatirātmanaḥprīto'smītyabravītkarṇaṃ vairamutsṛjya bhārata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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