महाभारत 12.52.2लोकनाथ महाबाहो शिव नारायणाच्युततव वाक्यमभिश्रुत्य हर्षेणास्मि परिप्लुतःlokanātha mahābāho śiva nārāyaṇācyutatava vākyamabhiśrutya harṣeṇāsmi pariplutaḥइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें