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महाभारत 12.82.20
वासुदेव उवाच · vāsudeva uvāca
अनायसं मुने शस्त्रं मृदु विद्यामहं कथम्येनैषामुद्धरे जिह्वां परिमृज्यानुमृज्य च
anāyasaṃ mune śastraṃ mṛdu vidyāmahaṃ kathamyenaiṣāmuddhare jihvāṃ parimṛjyānumṛjya ca
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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