महाभारत 12.9.23
एककालं चरन्भैक्ष्यं गृहे द्वे चैव पञ्च चस्पृहापाशान्विमुच्याहं चरिष्यामि महीमिमाम्
ekakālaṃ caranbhaikṣyaṃ gṛhe dve caiva pañca caspṛhāpāśānvimucyāhaṃ cariṣyāmi mahīmimām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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