महाभारत 12.9.2
सार्थगम्यमहं मार्गं न जातु त्वत्कृते पुनःगच्छेयं तद्गमिष्यामि हित्वा ग्राम्यसुखान्युत
sārthagamyamahaṃ mārgaṃ na jātu tvatkṛte punaḥgaccheyaṃ tadgamiṣyāmi hitvā grāmyasukhānyuta
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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