महाभारत 12.92.34
कृपणानाथवृद्धानां यदाश्रु व्यपमार्ष्टि वैहर्षं संजनयन्नॄणां स राज्ञो धर्म उच्यते
kṛpaṇānāthavṛddhānāṃ yadāśru vyapamārṣṭi vaiharṣaṃ saṃjanayannṝṇāṃ sa rājño dharma ucyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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