महाभारत 13.144.4
सदा द्विजातीन्संपूज्य किं फलं तत्र मानदएतद्ब्रूहि पितः सर्वं सुमहान्संशयोऽत्र मे
sadā dvijātīnsaṃpūjya kiṃ phalaṃ tatra mānadaetadbrūhi pitaḥ sarvaṃ sumahānsaṃśayo'tra me
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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