महाभारत 13.144.50
तथा त्वमपि कौन्तेय ब्राह्मणान्सततं प्रभोपूजयस्व महाभागान्वाग्भिर्दानैश्च नित्यदा
tathā tvamapi kaunteya brāhmaṇānsatataṃ prabhopūjayasva mahābhāgānvāgbhirdānaiśca nityadā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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