महाभारत 13.71.3
द्वारवत्यां यथा चासौ निविशन्त्यां समुद्धृतःमोक्षहेतुरभूत्कृष्णस्तदप्यवधृतं मया
dvāravatyāṃ yathā cāsau niviśantyāṃ samuddhṛtaḥmokṣaheturabhūtkṛṣṇastadapyavadhṛtaṃ mayā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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