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महाभारत 13.71.6
शक्र उवाच · śakra uvāca
स्वर्लोकवासिनां लक्ष्मीमभिभूय स्वया त्विषागोलोकवासिनः पश्ये व्रजतः संशयोऽत्र मे
svarlokavāsināṃ lakṣmīmabhibhūya svayā tviṣāgolokavāsinaḥ paśye vrajataḥ saṃśayo'tra me
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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