महाभारत 14.27.21
गिरयः पर्वताश्चैव सन्ति तत्र समासतःनद्यश्च सरितो वारि वहन्त्यो ब्रह्मसंभवम्
girayaḥ parvatāścaiva santi tatra samāsataḥnadyaśca sarito vāri vahantyo brahmasaṃbhavam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें