महाभारत 14.64.10
शङ्खादींश्च निधीन्सर्वान्निधिपालांश्च सर्वशःअर्चयित्वा द्विजाग्र्यान्स स्वस्ति वाच्य च वीर्यवान्
śaṅkhādīṃśca nidhīnsarvānnidhipālāṃśca sarvaśaḥarcayitvā dvijāgryānsa svasti vācya ca vīryavān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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