महाभारत 14.7.19
संवर्त उवाच · saṃvarta uvāca
चिकीर्षसि यथाकामं सर्वमेतत्त्वयि ध्रुवम्यदि सर्वानभिप्रायान्कर्तासि मम पार्थिव
cikīrṣasi yathākāmaṃ sarvametattvayi dhruvamyadi sarvānabhiprāyānkartāsi mama pārthiva
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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