महाभारत 14.74.5
ततो गाण्डीवनिर्मुक्तैरिषुभिर्मोहितो नृपःहयमुत्सृज्य तं वीरस्ततः पार्थमुपाद्रवत्
tato gāṇḍīvanirmuktairiṣubhirmohito nṛpaḥhayamutsṛjya taṃ vīrastataḥ pārthamupādravat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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