महाभारत 14.74.9
स वारणं नगप्रख्यं प्रभिन्नकरटामुखम्प्रेषयामास संक्रुद्धस्ततः श्वेतहयं प्रति
sa vāraṇaṃ nagaprakhyaṃ prabhinnakaraṭāmukhampreṣayāmāsa saṃkruddhastataḥ śvetahayaṃ prati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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