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महाभारत 14.95.23
अद्येह स्वर्णमभ्येतु यच्चान्यद्वसु दुर्लभम्त्रिषु लोकेषु यच्चास्ति तदिहागच्छतां स्वयम्
adyeha svarṇamabhyetu yaccānyadvasu durlabhamtriṣu lokeṣu yaccāsti tadihāgacchatāṃ svayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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