महाभारत 14.95.30
न्यायेनोत्तरकालं च गृहेभ्यो निःसृता वयम्धर्मदृष्टैर्विधिद्वारैस्तपस्तप्स्यामहे वयम्
nyāyenottarakālaṃ ca gṛhebhyo niḥsṛtā vayamdharmadṛṣṭairvidhidvāraistapastapsyāmahe vayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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