महाभारत 14.96.4
तत्क्षीरं स्थापयामास नवे भाण्डे दृढे शुचौतच्च क्रोधः स्वरूपेण पिठरं पर्यवर्तयत्
tatkṣīraṃ sthāpayāmāsa nave bhāṇḍe dṛḍhe śucautacca krodhaḥ svarūpeṇa piṭharaṃ paryavartayat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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