महाभारत 14.96.9
जमदग्निरुवाचसाक्षाद्दृष्टोऽसि मे क्रोध गच्छ त्वं विगतज्वरःन ममापकृतं तेऽद्य न मन्युर्विद्यते मम
jamadagniruvācasākṣāddṛṣṭo'si me krodha gaccha tvaṃ vigatajvaraḥna mamāpakṛtaṃ te'dya na manyurvidyate mama
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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