महाभारत 15.45.3
चिरस्य खलु पश्यामि भगवन्तमुपस्थितम्कच्चित्ते कुशलं विप्र शुभं वा प्रत्युपस्थितम्
cirasya khalu paśyāmi bhagavantamupasthitamkaccitte kuśalaṃ vipra śubhaṃ vā pratyupasthitam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें