महाभारत 15.45.4
के देशाः परिदृष्टास्ते किं च कार्यं करोमि तेतद्ब्रूहि द्विजमुख्य त्वमस्माकं च प्रियोऽतिथिः
ke deśāḥ paridṛṣṭāste kiṃ ca kāryaṃ karomi tetadbrūhi dvijamukhya tvamasmākaṃ ca priyo'tithiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें