महाभारत 2.1.11
यत्र दिव्यानभिप्रायान्पश्येम विहितांस्त्वयाआसुरान्मानुषांश्चैव तां सभां कुरु वै मय
yatra divyānabhiprāyānpaśyema vihitāṃstvayāāsurānmānuṣāṃścaiva tāṃ sabhāṃ kuru vai maya
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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