महाभारत 2.1.2
अस्माच्च कृष्णात्संक्रुद्धात्पावकाच्च दिधक्षतःत्वया त्रातोऽस्मि कौन्तेय ब्रूहि किं करवाणि ते
asmācca kṛṣṇātsaṃkruddhātpāvakācca didhakṣataḥtvayā trāto'smi kaunteya brūhi kiṃ karavāṇi te
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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