महाभारत 2.1.4
मय उवाच · maya uvāca
युक्तमेतत्त्वयि विभो यथात्थ पुरुषर्षभप्रीतिपूर्वमहं किंचित्कर्तुमिच्छामि भारत
yuktametattvayi vibho yathāttha puruṣarṣabhaprītipūrvamahaṃ kiṃcitkartumicchāmi bhārata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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